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दामिनी

मितुल एम जुगतावत

मितुल एम जुगतावत

कविता

January 22, 2017

चीख थी वो उसकी, पर किसी ने ना सुनी,
जिसने सुनी ,उसने कर दी अनसुनी.
जिसकी थी जीने की तमन्ना, वही हम सबको छोड चली
क्यों एक लडकी फिर से, इन दैत्यों के हाथों छली.
यहां हर बीस मिनट में लडकी , दानवों की बलि चढी
थी जो इस देश की राजधानी, वह अब बलात्कारियों की राजधानी है बनी.
इतना सब होने के बाद भी, पीडित लडकी ही दोषी बनी
देखो इन दुस्साहसी दानवों को ,अपनी गलती लडकी पर ही मढी.
क्या होगा अब इस देश का, इसी सोच में मैं अब तक पडी
जो आई थी इस देश में, सीख देने व बनाने एक मजबूत कडी.
एक मात्र जिसने चीख थी सुनी , वह सरकार के डर से उड चली
अब तो जो खेलते थे सालों से ,
चलो खेलें वही आंख मिचौली ,चलो खेलें वही आंख मिचौली
मितुल एम जुगतावत

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Author
मितुल एम जुगतावत
बी॰ ए। प्रथम वर्ष इतिहास (ऑनर्स) दिल्ली विश्वविध्यालय

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