Sep 17, 2016 · कविता
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दान’ हुई हकदार बदल गए

बिन तेरी मर्जी के बापू
कभी कही नही जाती थी
घर ऑगन मे चहक चहक
बस तेरा हुक्म बजाती थी

पर सहसा …

‘दान ‘ हुई हकदार बदल गए !
सारे ही अधिकार बदल गए
दिल के सब जज्बात सम्भल गए
अजब रीत पे चलना था !!!
सम्भल सम्भल पग धरना था …

पास तेरे आने को बापू !
हुक्म पति का लेना था
पास तेरे आने खातिर
साजन का मुह तकना था

घर ऑगन तज कर के अपना
साजन के घर सजना था

ऐ ! बापू ये पीर घनी है !
बरसो से ये रीत बनी है !

पलंग जहॉ मै सोती थी
अलसाई सी होती थी
लाड प्यार में भीगी भीगी
लाडो तेरी होती थी
बारिश की भीगी रातों मे मॉ का ऑचल होता था
शाम सबेरे सच मे बापू ..तेरा प्यार भिगोता था !!!

दायित्वों का बोझ लिए अब ‘ लाडो’ गुम हो जाती है
‘औरत ‘ का एहसास लिए वो सारे फर्ज निभाती है
आज तेरी लाडो को बापू …
मान तेरा तो रखना था
लॉघ तेरी दहलीज को बापू
सजना के घर सजना था ……
नीरा रानी

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NIRA Rani
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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे... View full profile
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