***दादी माँ की लाडली ***

।। ॐ परमात्मने नमः ।।
*** दादी की लाडली ***
जीवन सफर में संवारते पलों के साथ जीवन साथी का बिछोह बहुत ही दुखदायी होता है।अचानक से ही दुःखद घटनाओं का सामना करना बेहद कठिन होता है।
राधिका की दो बेटियों के बाद तीसरी बेटी सौम्या को जन्म देते ही समय चल बसी अब नन्ही सी जान बिटिया को कैसे और कौन सम्हाले ..? ?
दोनों बेटियाँ भी अभी उम्र में छोटी थी पिताजी मोहन के उपर बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी कुछ सूझ नही रहा था आखिर अब क्या करे ..? ?
दादी माँ गाँव में रहती थी उन्होंने कहा – मैं सब सम्हाल लूँगी चिंता मत करो – सौम्या की देखभाल की जिम्मेदारी दादी माँ नेअपने हाथों में ले लिया था।
दादी माँ उस नवजात बच्ची सौम्या को गाय का दूध पिलाकर पालन पोषण कर बड़ा किया देखते ही देखते वह बड़ी हो गई थी।
सौम्या भी दादी माँ के साथ रहकर घुल मिल गई थी सौम्या को कोई कुछ कह देता तो दादी माँ को बहुत बुरा लगता था।
दादी माँ ने बड़े ही नाजो से पाला उसे कुछ भी परेशानी या कष्ट होता तो खुद भी परेशान हो जाती उदास हो जाती थी आखिर क्या करे ..?
बहुत सारी परेशानियों को झेलते हुए सौम्या को बड़ा किया था ।समय बीतने पर सौम्या को शहर में रखते हुए शिक्षा दिलवाई ताकि गाँव में पली बढ़ी होने के कारण से सभी तौर तरीकों से वाकिफ हो सके।
राधिका की दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी । पिताजी भी गोलोक धाम चले गए और अब सौम्या भी सयानी हो चली थी उसकी भी शादी एक अच्छे नॉकरी पेशा में लगे हुए लड़के से शादी कर दी गई।
दादी माँ सौम्या के ससुराल जाने के बाद फिर उदास अकेले सी रह गई थी कभी कभी अपने पास बुला लेती थी ।
कुछ दिनों बाद सौम्या माँ बन गई एक सुंदर सी बेटी पल्लवी को जन्म दिया जिसकी देखरेख भी दादी माँ ने बड़े लाड प्यार से किया समय गुजरते देर नही लगती अब दादी माँ काफी उम्र हो जाने के कारण कमजोर होने लगी उनकी सेहत अच्छी नही थी उन्हें सहारे की भी जरूरत थी।
अब सौम्या दादी माँ की सेवा करने लगी दादी माँ को पेट में ट्यूमर हो गया इसका इलाज ऑपरेशन था परंतु उन्होंने ईलाज नही करवाया डॉक्टर भी ज्यादा उम्र होने के कारण से भी खून बनने के चांस शरीर में नही रहते हैं।
दादी माँ वैसे भी ईश्वर पर विश्वास रखती थी और अपनी पोती के साथ यूँ ही दिन गुजार रही थी । शारीरिक कमजोरी के कारण दादी माँ कहीं पर गिर पड़ी और पैर में ज्यादा चोट लगने से हड्डी टूट गई जिसकी वजह से चलने फिरने में दिक्कत होने लगा और पैर में प्लास्टर चढ़ गया था इन सभी परेशानियों के कारण खाना पीना भी कम हो गया ।
सौम्या दादी माँ की पूरी तरह से देखभाल करती थी और अपने परिवार को भी बखूबी से सम्हालती थी अंततः दादी माँ का स्वर्गवास हो गया और सौम्या निसहाय निःस्तब्ध सी रह गई थी …..! ! !
जीवन सफर में कुछ समय बाद सौम्या की दूसरी बेटी का जन्म हुआ जो हूबहू दादी माँ की शक्ल ले कर आई थी रंग ,रूप ,व्यवहार सभी चीजें समान रूप से दादी माँ की नकल भी उतारती थी उसका नाम ख़ुशी रखा गया सौम्या की दूसरी बेटी ख़ुशी को साथ रहकर ऐसा लगता था मानो फिर से दादी माँ ख़ुशी के रूप में वापस लौट आई हो ….! ! !
स्वरचित मौलिक रचना 📝📝
*** शशिकला व्यास ***
#* भोपाल मध्यप्रदेश *#

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