कविता · Reading time: 1 minute

दादा और नाना का दीवाना !

दादा और नाना का दीवाना !
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क्या ख़ास है उस तथाकथित नाना में !
जो लोग टूट पड़े हैं अनजान ख़ज़ाना में !
दादाजी पर तो लोग इतना ध्यान देते नहीं !
और नानाजी को सर ऑंखों पे बिठा लेते हैं !!

दादा और नाना दोनों ही पूज्य होते हैं।
नाना यदि हमारी माॅं के पापा होते हैं ।
तो दादा भी पापा के पापा ही होते हैं ।
तो क्यों हम दादाजी का ध्यान नहीं रखते हैं??

हम सभी बड़ो का सम्मान करना सीखें ।
चाहे दादा हों या नाना बराबरी का दर्जा दें ।
दोनों को ही अपने जीवन का आदर्श बना लें ।
नाना वामहस्त हैं तो दादा को दाहिना हाथ बना लें।।

संसार के सभी नाना और दादा को हम प्रणाम करते हैं।
वे दोनों ही पारिवारिक ढ़ांचे के दो भिन्न पहलू होते हैं।
पर किसी एक को भी हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते!
तब जाकर ये वातावरण , ये प्रकृति संतुलन में रहते हैं।।

मुझे तो नाना और दादा दोनों की ही याद आती है !
मैंने किसी को देखा नहीं तो वे सपनों में तो आते नहीं!
पर उनकी चर्चाऍं घर में कितनी बार आ ही जाती हैं !
आखिर हम सब तो उनके आशीर्वाद पे ही टिके हैं न !!

स्वरचित एवं मौलिक ।

अजित कुमार “कर्ण” ✍️✍️
किशनगंज ( बिहार )
दिनांक : २१/०६/२०२१.
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