कविता · Reading time: 1 minute

दहेज़ एक अभिशाप

मैं करुण वंदना करता हूँ ऐ प्रभु इसे स्वीकार करो
सृजनकर्ता खतरे में है अब थोड़ा सा उपकार करो
नाहक में मेरी बहना जो हर रोज जलाई जाती है मुख में मेरे शब्द नही इस कदर सताई जाती है
बापू की आँखों का तारा जब अर्थी में वो आती है
सहम जाती हैं दसों दिशाएं माता पिटे छाती है
दहेज़ रूपी राक्षस का प्रभु अब तो तुम संहार करो
मैं करुण वंदना करता हूँ ऐ प्रभु इसे स्वीकार करो

बापू ने गिरवी घर रखकर लक्ष्मी को कैसे भेजा था
लड़के को सबकुछ सौंप दिया माँ ने जो कभी सहेजा था
फिर भी उस हवसखोर की आत्मा शांत नही होती
कहा लक्ष्मी वापस जाओ तुम मेरी कोई नही होती
फिर यकायक लक्ष्मी की एक चीख सुनाई देती है
चीखते स्वर के बीच में एक भीख सुनाई देती है
मेरी लक्ष्मी फिर विदा हुई सारे संसार का दुःख लेकर
और दंरिदे जिन्दा हैं मेरी लक्ष्मी को दुःख देकर
बहुत बार झेला लक्ष्मी ने अब प्रभु इसका उद्धार करो
मैं करुण वंदना करता हूँ ऐ प्रभु इसे स्वीकार करो

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