गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

दहेज की आग

ज्वालामुखी सी सुलगती रहती है ये दहेज की आग,
हमने कानून बना दिए हैं सरकार अलापे यही राग।

पर दहेज की आग का दर्द एक पिता ही जानता है,
बेटी के सुख की चिंता में जो कब से से रहा है जाग।

सब कुछ बेच दिया उसने बेटी की खुशियों के लिए,
फिर भी पल पल खुशियों को डसता दहेज का नाग।

बेटे वाले खुश हो लेते हैं दहेज को बटोरकर पल भर,
भूल जाते हैं बेटा बेचा है उन्होंने, कैसे धुलेगा ये दाग।

मारी जाती हैं ना जाने कितनी बेटियाँ दहेज के कारण,
मार कर दूसरे की बेटी कहते पीछा छूटा थी वो निर्भाग।

कैसे भला होगा इन दहेज के लोभियों का खुद सोचो,
जब बीतेगी इनके साथ निकलेगा इनके मुँह से झाग।

कानून बनाने से कुछ नहीं होगा, सोच बदलनी होगी,
घटिया सोच के कारण खुद से ही रहे हैं लोग भाग।

घर के आँगन में लगी तुलसी, गृहलक्ष्मी होती है बहु,
जागरूकता फैलाने का सुलक्षणा को लगा है वैराग।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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