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“दहेजी प्यार”(सामाजिक व्यंगात्मक कविता) ….

“दहेजी प्यार”
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शादी में वहीं होता है, “प्यार”;
जहां धन बिन, बसे संसार।

क्या? दहेज़ी शादी में भी होता है प्यार;
हां , होता है अगर,;
तो क्या, वो सही में प्यार होता है।

इतना तो है, कि;
दहेज धन से तत्काल एक घर आबाद होता है।

क्या? दहेजियों में भी संस्कार होता है;
हां , होता है अगर;
तो क्या, सही में वो संस्कार होता है।

आखिर ,
जब बिन धन लड़की का तिरस्कार होता है;
तो फिर कैसे दहेजी शादी में कोई प्यार होता है।

अरे! शादी खुद एक संस्कार होता है,
शायद ,दहेजी शादी ही एक व्यापार होता है।

खुशियां भी होती है, यहां;
पता नही, दहेज की या शादी की,
या पीड़ित पिता के घर के बर्बादी की।

तो आखिर कैसे?
दहेजी शादी में भी प्यार होता है,
जब एक तरफ पिता/ससुर कर्ज में बैठा घर पर रोता है।

दहेज धन पर नाचते है, सब कितना;
शायद, मेहनत के धन पर नही उसे एतबार होता है।

क्या? दहेजी शादी में भी प्यार होता है,
या ये सिर्फ , दहेजी प्यार होता है।

जो जितना बड़ा, उतना ही ;
दहेज के लिए रोता है।
विश्वास नहीं होता कि;
दहेजी शादी में भी प्यार होता है।

स्वरचित सह मौलिक
पंकज कर्ण
कटिहार।

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