दशलक्षण ( पर्युषण) महापर्व- बहुत ही रोचक जानकारी

आज में आप सभी के सम्मुख बहुत ही रोचक जानकारी प्रस्तुत कर रही हूँ। विषय है *”दिगंबर जैन सम्प्रदाय में पर्युषण पर्व”*
भारत वसुंधरा धार्मिक विविधताओं का देश है। भिन्न भिन्न धर्मानुयायियों में धार्मिक सम-रसता भी है। सभी परस्पर अन्य धर्मों का आदर व् सम्मान करते हैं। और मूल में देखें तो भारत वर्ष सभी धर्म प्राणी मात्र के कल्याण की ही बात करते हैं। हम सभी को भी भिन्न भिन्न धर्मो के रूप में भारतीय संस्कृति के अलग-२ रंगों को अनुभव करना चाहिए।
पर्यूषण पर्व जैन धर्म का मुख्य पर्व है। श्वेतांबर इस पर्व को 8 दिन और दिगंबर संप्रदाय के जैन अनुयायी इसे दस दिन तक मनाते हैं। इस पर्व में जातक विभिन्न आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग जैसी साधना तप-जप के साथ करके जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं।
दिगंबर जैन समाज में पयुर्षण पर्व/ दशलक्षण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा, दूसरे दिन उत्तम मार्दव, तीसरे दिन उत्तम आर्जव, चौथे दिन उत्तम सत्य, पांचवें दिन उत्तम शौच, छठे दिन उत्तम संयम, सातवें दिन उत्तम तप, आठवें दिन उत्तम त्याग, नौवें दिन उत्तम आकिंचन तथा दसवें दिन ब्रह्मचर्य तथा अंतिम दिन क्षमावाणी के रूप में मनाया जाएगा। दशलक्षण पर्व के दौरान जिनालयों में धर्म प्रभावना की जाएगी।
दिगंबर जैन सम्प्रदाय में १० दिनों तक चलने वाला यह पर्व अत्यन्त रोचक है निश्चित यह इसकी व्याख्या को जानकर आप सभी को आनंद की अनुभूति होगी।
पर्युषण का प्रथम दिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी से प्रारंभ होता है, इस प्रथम दिन को सभी जैन जन *”उत्तम क्षमा धर्म”* के रूप में मनाते हैं। सभी दिगंबर जैन जिनालयों पर सुबह श्रीजी (भगवान) के अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजन के साथ प्रवचन, तत्वार्थ सूत्र का वाचन, प्रतिक्रमण, महाआरती व सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।

1. क्षमा- सहनशीलता। क्रोध को पैदा न होने देना। क्रोध पैदा हो ही जाए तो अपने विवेक से, नम्रता से उसे विफल कर देना। अपने भीतर क्रोध का कारण ढूंढना, क्रोध से होने वाले अनर्थों को सोचना, दूसरों की बेसमझीका ख्याल न करना। क्षमा के गुणों का चिंतन करना।

2. मार्दव- चित्त में मृदुता व व्यवहार में नम्रता होना।
3. आर्दव- भाव की शुद्धता। जो सोचना सो कहना। जो कहना सो करना।

4. सत्य- यथार्थ बोलना। हितकारी बोलना। थोड़ा बोलना।

5. शौच- मन में किसी भी तरह का लोभ न रखना। आसक्ति न रखना। शरीर की भी नहीं।

6. संयम-मन, वचन और शरीर को काबू में रखना।

7. तप- मलीन वृत्तियों को दूर करने के लिए जो बल चाहिए, उसके लिए तपस्या करना।

8. त्याग- पात्र को ज्ञान, अभय, आहार, औषधि आदि सद्वस्तु देना।

9. अकिंचनता- किसी भी चीज में ममता न रखना। अपरिग्रह स्वीकार करना।

10. ब्रह्मचर्य- सद्गुणों का अभ्यास करना और अपने को पवित्र रखना।

1- जानें ‘उत्तम क्षमा’ का स्वरूप :-

क्रोध एक कषाय है। जो व्यक्ति को अपनी स्थिति से विचलित कर देती है। इस कषाय के आवेग में व्यक्ति विचार शून्य हो जाता है। और हिताहित का विवेक खोकर कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। लकड़ी में लगने वाली आग जैसे दूसरों को जलाती ही है, पर स्वयं लकड़ी को भी जलाती है। इसी तरह क्रोध कषाय के स्वरूप को समझ लेना और उस पर विजय पा लेना ही क्षमा धर्म है।

मनीषियों ने कहा है कि क्रोध अज्ञानता से शुरू होता है और पश्चाताप से विचलित नहीं होना ही क्षमा धर्म है। पार्श्वनाथ स्वामी और यशोधर मुनिराज का ऐसा जीवन रहा कि जिन्होंने अपनी क्षमा और समता से पाषाण हृदय को भी पानी-पानी कर दिया। शत्रु-मित्र, उपकारक और अपकारक दोनों के प्रति जो समता भाव रखा जाता है वही साधक और सज्जन पुरुषों का आभूषण है। शांति और समता आत्मा का स्वाभाविक धर्म है, जो कभी नष्ट नहीं हो सकता।
यह बात अलग है कि कषाय का आवेग उसके स्वभाव को ढंक देता है। पानी कितना भी गरम क्यों न हो पर अंतत: अपने स्वभाव के अनुरूप किसी न किसी अग्नि को बुझा ही देता है। अज्ञानी प्राणी अपने इस धर्म को समझ नहीं पाता। कषायों के वशीभूत होकर संसार में भटकता रहता है। इसलिए अपने जीवन में क्षमा को धारण करना चाहिए और नित्य यह भावना रखनी चाहिए।
इसीलिए कहा गया है कि –
सुखी रहे सब जीव, जगत में कोई कभी ना घबरावें।
बैर, पाप, अभिमान, छोड़, जग नित्य नए मंगल गावें।
इस दिन जैन जन *उत्तम क्षमा धर्म* की आराधना हेतु जो भावना करते हैं उसको किसी कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-

१. *पीडै दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करै।*
*धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजै पितमा।।*
*अर्थात* – कोई दुष्ट व्यक्ति आपको कई तरह से पीड़ा पहुँचा रहा है तो भी आप उसके प्रति क्षमा भाव धारण करें, उसके प्रति क्रोध भाव ना धरें।

२. *उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह-भव जस पर भव सुखदाई।*
*गाली सुन मन खेद ना आनो, गुण को औगुन कहै आयनों।।*
*अर्थात* – हे मनुष्य उत्तम क्षमा को धारण करो। यह क्षमा इस लोक और परलोक में सुख देने वाली है। यदि कोई गुणों को भी अवगुण कहता है या गाली भी देता है तो भी मन में खेद नहीं करना चाहिए।

३. *कहि है आयनों वस्तु छीनै, बाँध मार बहु विधि करै।*
*घर तै निकारै तन विरादै, वैर जो ना तहाँ धरै।।*
*अर्थात* – कोई वस्तु छींनता है, अनेक तरह से प्रताढित करता है, घर से निकालने पर, शरीर को कष्ट देने पर भी क्षमाशील व्यक्ति कष्ट देने वाले के प्रति वैर भाव नहीं रखता।

४. *तै करम पूरब किए खोते, सहै क्यों नहीं जीयरा।*
*अति क्रोध अग्नि बुझाय प्राणी, साम्य जल ले सीयरा।।*
कोई व्यक्ति इतनी क्षमा क्यों धारण करे इस बात को समझने के लिए उपरोक्त पंक्तियाँ महत्वपूर्ण हैं।
*अर्थात* – वर्तमान में जो भी प्रतिकूलता मिलती है वह पूर्व समय में उपार्जित कर्मो का ही प्रतिफल होता है अतः हे प्राणी तू इसे शांत भाव से सहन क्यों नहीं करता है। अधिक क्रोध रूप अग्नि को शांत करने के समता रूपी जल का उपयोग करना चाहिए।

पूर्वोपार्जित कर्मो का ही प्रतिफल है वर्तमान की प्रतिकूलता। इस कथन को रामचरित मानस की इन पंक्तियों से भी समझा जा सकता है-

*”करम प्रधान जगत करि रखा, जो जस करही सो तस फल चाखा।”*
क्या पर्युषण पर्व, इस *”क्षमाभाव”* को सिर्फ एक दिन को धारण करने को कहता है? उत्तर है नहीं , एक दिन में आप अभ्यास कीजिए और संपूर्ण जीवन के लिए इस कल्याण करी बात को धारण कीजिए।

2- दया भाव ही ‘उत्तम मार्दव’ धर्म का मूल :-
अहंकार का भाव न रक्खूं, नहीं किसी पर क्रोध करूं,
देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्ष्या-भाव धरूं।
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूं,
बने जहां तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूं।।

3- ‘उत्तम आर्जव’ यानी माया का अभाव : –
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य व्यवहार करूं।
बने जहां तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूं।

4- ‘उत्तम शौच’ पवित्रता का प्रतीक :-
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवें या जावें
अनेक वर्षों तक जीऊं या मृत्यु आज ही आ जावे।
अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे,
तो भी न्याय मार्ग से मेरा, कभी न पग डिगने पावे।

5- ‘उत्तम सत्य’ की महिमा :-
सत्य को धारण करने वाला हमेशा अपराजित, सम्मानीय एवं श्रद्धेय होता है। दुनिया का सारा वैभव उसके चरण चूमता है। फिर उसकी ऊर्जा कभी भी क्रोध आदि के रूप में विघ्वंसक रूप धारण नहीं करती।

6- उत्तम संयम’ यानी इंद्रिय को वश में रखना :
जिस बिना नहीं जिनराज सीझे, तू रूल्यों जग कीच में।
इक घरी मत विसरो, करो नित, आव जम-मुख बीच में।।

7- उत्तम तप’ है साधना का मार्ग :-
ज्ञान दीप तप तेल भर, घर शोधे भ्रम छोर।
या विध बिन निकसे नहीं, पैठे पूरब चोर।।

8- उत्तम त्याग : प्रकृति देती है त्याग की प्रेरणा :-
दान देय मन हर्ष विशेषे,
इह भव जस, परभव सुख पेषे।।

9- * ‘उत्तम अकिंचन’ यानी आत्मकेंद्रित करना :-
आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय।
यूं कबहूं इस जीव का, साथी सगा न कोय।।

10- ‘उत्तम ब्रह्मचर्य’ पर-पदार्थों का त्याग :-

उक्त क्षमा आदि-आठ धर्म-साधन रूप धर्म होते हैं, जिनके अंगीकार करने पर साध्य रूप धर्म ब्रह्मचर्य की उपलब्धि स्वयंमेव हो जाती है। जब कोई साधक क्रोध, मान, माया, लोभ एवं पर-पदार्थों का त्याग आदि करते हैं और पर-पदार्थों से संबंध टूट जाने से जीव का अपनी आत्मा (जिसे ब्रह्म कहा जाता है) में ही रमण होने लगता है।

एक महत्वपूर्ण बात। आप सोचेंगे की ऊपर की व्याख्या से तो लगता है कि कोई किसी को कितना भी कष्ट दे तो उसे कुछ नहीं करना चाहिए। ऐंसा नहीं है, अपनी, अपने परिवार की, समाज की, राष्ट्र की, धर्म की रक्षा हेतु आपको प्रतिकार करना चाहिए व् इन सभी की रक्षा अवश्य करना चाहिए।

लेखिका- जयति जैन (नूतन) ‘शानू’……. रानीपुर झांसी

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