*दर्द*

आधार छंद =आनंदवर्धक
मापनी =2122 2122 212
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दर्द में भी मुस्कुराना आ गया
आँख में आँसू छिपाना आ गया
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नफरतों को दिल ‘से ‘सारी भूल कर
प्रीत के ही गीत गाना आ गया
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बचपनों की देख कर अठखेलियाँ
याद फिर गु़जरा जमाना आ गया
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उलझनें दिल से हमारे मिट गयी
आज फिर मौसम सुहाना आ गया ~~~~~~~~~~~~~~~~~
ज़िंदगी में अब नहीँ हैं आंधियाँ
मुश्किलों से पार पाना आ गया

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*काव्य-माँ शारदेय का वरदान * Awards: विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित
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