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दर्द सह लूंगा

Bikash Baruah

Bikash Baruah

कविता

October 13, 2017

दर्द सह लूंगा मैं यूंही
जिंदगी गुजार दूंगा मैं यूंही,
शिकवा किसीसे कुछ नहीं
साया भी छोड़ देती साथ यूंही।

बहाऊँ आसूँ क्यों किसके लिए
नहीं जब कोई यहाँ अपने-पराए,
जीना-मरना सब बेमानी सी लगती
यहाँ इंसान नहीं इंसान के लिए ।

मतलब परस्त है लोग यहाँ
हर एक एहसान की कीमत लगाते,
खाना नहीं श्वास का भी मोल यहाँ
सभीको पाई-पाई चुकाने पड़ते ।

Author
Bikash Baruah
मैं एक अहिंदी भाषी हिंदी नवलेखक के रूप मे साहित्य साधना की कोशिश कर रहा हू और मेरी दो किताबें "प्रतिक्षा" और "किसके लिए यह कविता" प्रकाशित हो चुकी है ।
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