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दर्द समझ में आया

Bhupendra Rawat

Bhupendra Rawat

कविता

August 19, 2017

छत में खिलखिलाती गुलाब की
कलियों ने एक सवाल किया
जब मुझे तुमने तोडा था
मेरे दर्द का कभी ख्याल किया
मैं भी उनसे सहम कर बोला
दर्द को तुम्हारे मैंने कभी नही था तोला
अब अलग होने का दर्द समझ में आया
बिखर गया मैं भी जब वो मुझसे अलग होने को आया
ख़ुद के तारों को गर्दिश में पाया
दिल था बेचारा समझ ना पाया
टूट कर फ़िर जुड़ ना पाया
खिलखिलाती कलियों से गुलाब
के अलग होने का दर्द समझ में आया
खुद को जब मैंने दर्द में पाया
बहता हुआ दरिया रुक ना पाया
दिल को सबने ख़ूब समझाया
नदान दिल के कहाँ समझ में आया
दिल लगा कर बहुत पछताया
हँसता चेहरा भी मुरझाया
लबों ने उसका नाम दोहराया
अक्स मुझ पर उसका नज़र है आया
मुझको उसने बहुत छालाया
रातों को रोज़ जगाया
ख़्वाबों का भण्डार लगाया
हक़ीकत से मुझको भटकाया
ख़्वाबों में जीना सीखाया
नींदों में मुझको तड़पाया
रूह को मेरी अपना बताया
उनका खेल समझ ना पाया
दर्द मुझे समझ में आया
कलियों ने भी खूब सताया
टूटे दिल का मजाक बनाया
ख़्वाब टूटने का मंजर समझ में आया

भूपेंद्र रावत
19।08।2017

Author
Bhupendra Rawat
M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।
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