दर्द किसान का

*दर्द किसान का*
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अन्न को उगाता है जो, खेतों में चलाता हल,
खून को जलाता है वो, बहाता पसीने को ।
चाँदी को बिखेरता है, दाँव बड़ा खेलता है,
पासा चित पड़ जाये, बल पाता जीने को ।।
फलियाँ सुनहरी जो , झूमती हैं इठला के ,
जागतीं उमंग उर, आसमान छीने को ।
दैव का प्रकोप देख , भाल को पकड़ता है,
होता मजबूर आह , अन्नदाता पीने को ।।
***
इन्द्र ने किया प्रकोप , ओले पड़े बारिस में
टूट गये सपने से , बेबस किसान के ।
सदमा लगा है बड़ा , टूट अरमान गये,
लाले से पड़े हैं उसे, अपनी ही जान के ।।
कहाँ से चुकाये कर्ज , कहाँ से भरेगा ब्याज ,
जागे रैन सो न पाये , चादर को तान के ।
ऐसा हो प्रयत्न अब, जीवन न भार बने,
जियें रे किसान फिर आन-बान-शान से ।।
***
-महेश जैन ‘ज्योति’
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