कविता · Reading time: 1 minute

दफ़न

अपने आप में ही
दफ़न हुए जाते हैं
फिर भी शिकायत है इस ज़माने को
हम इसे समझ नहीं पाते हैं
इसको समझने में
अपने को समझाने में
ये उम्र यूँ ही निकल जाती है
न हम ही समझ पाते हैं
न इसे ही समझा पाते हैं
और
अपने में ग़ुम
कहीं खोये से
यूँ ही चले जाते हैं
किसी मोड़ पर
ज़रा सा मुसकुरा पड़े
तो इनके मुख में
यूँ ही छाले पड़ जाते हैं
फिर भी हम क्यूँ दफ़न हुए जाते हैं..

सुनील पुष्करणा

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