दफ़न

अपने आप में ही
दफ़न हुए जाते हैं
फिर भी शिकायत है इस ज़माने को
हम इसे समझ नहीं पाते हैं
इसको समझने में
अपने को समझाने में
ये उम्र यूँ ही निकल जाती है
न हम ही समझ पाते हैं
न इसे ही समझा पाते हैं
और
अपने में ग़ुम
कहीं खोये से
यूँ ही चले जाते हैं
किसी मोड़ पर
ज़रा सा मुसकुरा पड़े
तो इनके मुख में
यूँ ही छाले पड़ जाते हैं
फिर भी हम क्यूँ दफ़न हुए जाते हैं..

सुनील पुष्करणा

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suneelpushkarna@gmail.com समस्त रचना स्वलिखित
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