था खौफ ए दुनियां तो ख्वाबों में रबता करते

था खौफ ए दुनियां तो खुवाबों में राब्ता’करते”
मेरे वजूद से खुद को यूँ आशना’ करते।

जो अपनी ज़ुल्फों का तुम साया कर दिया’करते”
उबूर आग का हम दरिया कर लिया’ करते।

तुम्हारा प्यार अगर खून की तलब करता”
तुम्हारे वास्ते सर तन से हम जुदा’ करते!

हमारी सिम्त अगर हाथ तुम बढ़ा देते”
तो हम भी तुम से तअल्लुक़ न मुनक़ता’ करते।

जो अपने चेहरे की दिखती न धूल तुमको अगर”
तुम्हारे रू ब रू हम एक आइना’ करते।

जलाके खुद को दियों की ज़ियाई की खातिर”
बस एक बार चराग़ों का हक़ अदा’ करते।

तुम्हारे छूने के होते न मुन्तज़िर जो गुल”
क़सम खुदा की न गुलशन में ये खिला’ करते।

जमील कोई भी रंजो अलम नहीं रहता”
जो चलके दश्त में तनहा खुदा खुदा’ करते।
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जमील सक़लैनी

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