तड़प

ऐ दोस्त! गुजरा ज़माना आज फिर से याद आ गया।
गुलदस्ता उसकी यादों का तन बदन को महका गया।

सब कुछ भूल गया मानो वक़्त कुछ पल को ठहर गया,
याद आई वो ऐसे मुझे जैसे सर्द रात में कोहरा छा गया।

उसकी मोहिनी सूरत आँखों में उतर आई एकदम से,
चँदा सा चेहरा उसका मुझको आज फिर बहका गया।

उसकी हिरणी सी आँखें बहुत कुछ कह जाती थी,
पर मुझसे आँखों के जरिये दिल का हाल पढ़ा ना गया।

वो लम्हा भी क्या लम्हा था जब उसने गुलाब दिया था,
किताब में रखा वो गुलाब आज मन को गुदगुदा गया।

एक दूजे के होकर भी हम एक दूजे के ना हो सके,
इस बेदर्द ज़माने से दो दिलों का मिलन ना देखा गया।

यहाँ “विकास” रोता रहा वहाँ “सुलक्षणा” तड़पती रही,
देकर गम जुदाई का हमको ये बेदर्द ज़माना हँसता गया।

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