मुक्तक · Reading time: 1 minute

तौहफा समझ के ………..

तौहफा समझ के झोली में डाली नहीं गयी,
आज़ादी इक दुआ थी जो खाली नहीं गयी|
बलिदान तो अनमोल थे कीमत चुकाते क्या |
हमसे तो विरासत भी संभाली नहीं गयी|

हवा का रुख किधर होगा ,सही पहचानते हैं हम,
वही कर के दिखा देते जो मन में ठानते हैं हम|
वतन का क़र्ज़ है हम पर हमारे खूं का हर कतरा ,
इसे कैसे चुकाना है बखूबी जानते हैं हम|
–आर० सी० शर्मा “आरसी”

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