तोटक छंद

तोटक छंद

तज के जग के हर बंधन को
अब बैठ गई मन मंथन को
मनुहार करूँ भगवान यही
नित दे मुझको अभिज्ञान सही

अभिमान रहे न रहे कटुता
सब दोष हरो करना शुचिता
मँझधार पड़ी नइया अपनी
भवपार करो विनती इतनी

सब संत कहे हरिनाम जपो
इक टेर लगा बस राम तपो
खुद में जब पाय लिया तुझको
फिर खोज रहा मन ये किसको

नव पुष्प समान हिया महका
हर सांस बनी जप का मनका
तिनका तिनका जब दर्प किया
शरणागत हो अब हर्ष भया
Megha

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