गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

“तेरे हुस्न से नहीं ,तेरी सादगी से प्यार करता हूं”

तेरे हुस्न से नहीं ,तेरी सादगी से प्यार करता हूं।
मैं तेरी खातिर , ख़ुद से ही लड़ता हूं।
तेरे हुस्न से नहीं ,तेरी सादगी से प्यार करता हूं।
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बहुत मासूम हो तुम ,और अनजान भी।
मैं दिन रात ख़ुदा से दुआ में, तेरा ही हाथ मागता हूं।
तेरे हुस्न से नहीं ,तेरी सादगी से प्यार करता हूं।
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तुम वो चिराग़ हो जो खुद जल, दुनिया को रोशनी देती हो।
मैं भी दीपक बुझा ,तुम्हारा ही इंतेजार करता हूं।
तेरे हुस्न से नहीं ,तेरी सादगी से प्यार करता हूं।
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बेबस नहीं होता तो ,तुझे छीन लेता तेरे अपनों से।
पर मैं तेरी इज्जत को ,अपनी इज्ज़त बना के चलता हूं।
तेरे हुस्न से नहीं, तेरी सादगी से प्यार करता हूं।
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कितना चाहता हूं तुझे, ये बता नहीं सकता बस इतना जान ले।
मै तेरे इश्क को अपनी, रूह में बसा के चलता हूं।
तेरे हुस्न से नहीं, तेरी सादगी से प्यार करता हूं।

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