कविता · Reading time: 1 minute

तेरे मेरे दर्मियान

दूरियां बहुत हो गई है अपने दरमियान ,
क्यों ना मिटाया जाए ।
थोड़े तुम थोड़े हम क्यों ना चला जाए ।।

वक्त ने शायद अब तो कम कर दी होगी कुछ तकलीफे ।
कुछ तुम कहो कुछ मैं कहूं , क्यों ना बाकी को भी दूर किया जाएं ।।

बगिया में गुलाब के पौधे धीरे धीरे अब मुरझा रहे है ।
और बालकनी में रखी दो कुर्सियां भी कभी से खाली है ।।
क्यों ना बगिया को सिंचा जाए और बैठ बालकनी में कुर्सियों पर कोई ख्वाब नया देखा जाए ।

तुम कहो तो एक शुरुवात की जाएं ।
एक सफ़र फिर से तय किया जाए। ।

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लेखक हूं या नहीं, नहीं जानता , हा पर चले आते है कुछ शब्द लबो पर बस उन्हें अपनी DEAR DIARY में सवार लेता हूं । WhatsApp:- 7976662553 Email: -…
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