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**** तेरे छूने से ***

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

कविता

February 6, 2017

तेरे छूने से एक
सिहरन सी उठती है
जो तुझे और मुझे
अंतर तक
हिला देती है
इक भूकम्प सा
ला देती है
न तुम सम्भल पाते
ना हम ।।
दोनों लड़खड़ाकर कर
गिर पड़ते हैं बिस्तर पर
तो ऐसा लगता है कि
भूचाल आ गया हो
बिस्तर की भी रूह
कांप जाती है
पलंग तो क्या
धरती भी हिल जाती है ।।
दीवारें भी सुनने
लगती हैं
शायद कयामत
आ गयी हो
फिर कुछ क्षण बाद
तूफ़ान के पश्चात
शांति का
अहसास होता है
शायद दो तारों का
वह रुक-रुक के मिलना
ख़तरे का अहसास
या एक विस्फोट
मिलने के पूर्व का
मिलने के पश्चात
एक होने पर
परम् शांति
कतरा-कतरा
नदी का सागर में
मिलने को आतुर
अब शायद
नदी नदी नहीं
सागर का ही
प्रतिरूप था ।।
यह सब क्या था
शायद तेरा-मेरा
वह पहला मिलन
था ।।
?मधुप बैरागी

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Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल 13.7.2017 स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना... Read more

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