कविता · Reading time: 1 minute

**** तेरे छूने से ***

तेरे छूने से एक
सिहरन सी उठती है
जो तुझे और मुझे
अंतर तक
हिला देती है
इक भूकम्प सा
ला देती है
न तुम सम्भल पाते
ना हम ।।
दोनों लड़खड़ाकर कर
गिर पड़ते हैं बिस्तर पर
तो ऐसा लगता है कि
भूचाल आ गया हो
बिस्तर की भी रूह
कांप जाती है
पलंग तो क्या
धरती भी हिल जाती है ।।
दीवारें भी सुनने
लगती हैं
शायद कयामत
आ गयी हो
फिर कुछ क्षण बाद
तूफ़ान के पश्चात
शांति का
अहसास होता है
शायद दो तारों का
वह रुक-रुक के मिलना
ख़तरे का अहसास
या एक विस्फोट
मिलने के पूर्व का
मिलने के पश्चात
एक होने पर
परम् शांति
कतरा-कतरा
नदी का सागर में
मिलने को आतुर
अब शायद
नदी नदी नहीं
सागर का ही
प्रतिरूप था ।।
यह सब क्या था
शायद तेरा-मेरा
वह पहला मिलन
था ।।
?मधुप बैरागी

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