तेरी वो ही मीरा हूँ

तेरी वो ही मीरा हूँ
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तेरी बज़्म में आकर हम
खुद को ही भुला बैठे।
बस तू ही नज़र आता
सब तुझपे लुटा बैठे।

कुदरत की फ़िज़ाओं में
तेरा रूप लखा हमने।
कर सुमिरन मीत मेरे
हर स्वाद चखा हमने।

तेरी छाया में रहकर
पायी तरुणाई है।
खुशियों से भर दामन
ज़न्नत सी छाई है।

रग रग में नाम तेरा
मेरे आन समाया है।
जब जब मूँदी अँखियाँ
तेरा दर्शन पाया है।

तेरा रूप गज़ब का है
हैं शब्द नहीं कोई।
गल डाल के बहियाँ मैं
बस सुपक सुपक रोई।

भर बाँहों में भगवन
तूने पीर मिटाई है।
अपनी इस माही को
आ राह दिखाई है।

तेरे रस्ते चल करके
बस गीत तेरे गाऊँ।
भूलूँ न कभी तुझको
इतनी रहमत पाऊँ।

तुझको माँगूँ तुझसे
कुछ और नहीं माही।
तेरी वो ही मीरा हूँ
तेरी ख़ातिर ही आयी।

✍© डॉ० प्रतिभा माही

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मैं प्रेम श्रृंगार लिखती हूँ...सुरों के साज़ लिखती हूँ... लिखती हूँ रब के अनमोल वचन....और...
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