गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

तेरी मुहब्बत में हम खुद से गये हैं

तेरी मुहब्बत में हम खुद से गये हैं
पहले बहुत कुछ थे अब कुछ से गये हैं

झड़ गये पत्ते शाख से बिछड़े फूल
आँधियों से उलझकर लुट से गये हैं

आई जब मेरी बारी तो टूट गया
जाने कितने लोग इस पुल से गये हैं

मौसम-ए-वस्ल-ए-यार सबसे हसीं लगा
गुजर के हर जज़्बात हर रुत से गये हैं

जब से फूल और फलों वाले हुए हैं
मेरी बस्ती के शज़र झुक से गये हैं

मतलबी उन लोगों को देखता हूँ में
बहाने ढूँढनें में जुट से गये हैं

तुम क्या ‘सरु’ क्या आज के बच्चे भी
वक़्त के साथ बहुत खुल से गये हैं

1 Like · 1 Comment · 68 Views
Like
230 Posts · 10.2k Views
You may also like:
Loading...