Dec 2, 2016 · कविता
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तेरी जुल्फ़ों का ज़ादू

मैंने कहा श्री मान जी!तेरी जुल्फ़ों में तो ज़ादू है।
श्री मानजी जी संवर उठे।
चंदन-से बिखर उठे।
सलमान-से निखर उठे।
मैंने फिर से कहा—-
श्री मान जी आपकी जुल्फ़ों में तो ज़ादू है।
पर आपकी जुल्फ़ों से निकल ये जुओं की बारात सजी आ रही है इनपर क्यों नहीं क़ाबू है।
श्री मानजी हाथ जुड़वा लीजिए,
पांव भी पकड़वा लीजिए,
पर इतना कर्म फ़रमा दीजिए।
अपनी जुल्फ़ों का ज़ादू ,
कहीं और जाकर चला लीजिए।
अच्छा होगा किसी हज़्ज़ाम के पास जा।
इन जुल्फ़ों को कटवा लीजिए।
कटवा लीजिए न……।

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आर.एस. 'प्रीतम'
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🌺🥀जीवन-परिचय 🌺🥀 लेखक का नाम - आर.एस.'प्रीतम' जन्म - 15 ज़नवरी,1980 जन्म स्थान - गाँव... View full profile
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