तेरी आँखों के इशारे

29.12.16 ***** प्रातः 10.45
आज एक छोटा सा प्रयास
ग़ज़ल
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प्रारम्भिक बोल
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जानेमन तेरी आँखों के इशारे ही बहुत है
हमें अब मय पीने की जरूरत क्या है।।
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जो नशा तेरी मदमस्त निगाहों में है
वो नशा शराब में है ना पैमानों में है ।।
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ये तेरी नजरों के बैखोफ इशारे हैं
जो मेरा दिल चीर के चले जाते हैं।।
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तेरी तीरे नज़र मुझको करती घायल
उस पे तेरी ये छमछम करती पायल ।।
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जान मेरी ये लेकर जायेगी
जान मुझसे दूर रह पायेगी।।
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मुझको ना अब है हूर की चाहत
दूर रहकर ना करो मुझको आहत।।
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तेरे गेसू के घने साए में जीकर
तेरी आँखों से मय मैं पीकर।।
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तेरी आँखों में अक्स अपना देखूं
पी कर नजरों से झूमकर देखूं।।
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हो इजाज़त तो तेरे प्यार के साए में जी लूं
तेरी इन मदभरी आँखों के पैमानों से पी लूं।।
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जो नशा तेरी इन मदभरी आँखों में है
वो नशा शराब में है ना पैमानों में है।।
****** ?मधुप बैरागी

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