कविता · Reading time: 2 minutes

तृष्णा से पूर्णता की ओर!

थी लालसा,पद प्रतिष्ठा को पाने की,मैं आतुर रहा,
आया चुनाव गांव-निकाय का,मै तैयार हुआ।

मिलते ही अवसर मैंने भी ,चुनाव लडा,
लडकर चुनाव में मैंने अपने-पराये का अहसास किया !
जम कर किया प्रयास हम सबने,और तब सफल मैं हुआ।
किया काम मैने समर्पित होकर,कार्यकाल पूरा किया!
अब पद आरक्षित हो गए,मैं चुनाव लड ना सका,
मित्रों ने तब सुझाया,पत्नी को तैयार किया।
हार मिली इस बार हमें, सहर्ष इसे स्वीकार किया!
समर्पित रहा मै जनसेवा में,बिना पद के भी कार्य किया।
पुनः चुनाव की बेला आई,निर्विरोध मुझको अब चुन लिया।
अवसर मिला था जो अब मुझे,जम कर फिर से काम किया।
अब मैंने चाहा था पद पृथक ,उसके लिए आवेदन किया,
मेरे प्रतिभाग को जन मन ने,अस्वीकार किया।
मेरा सपना टूटा ऐसे,सब कुछ चकनाचूर हुआ।
पर लालसा-तृष्णा थी बनी हुई,फिर एक और प्रयास किया ,
हो गया था मोहभंग, मुझसे ,मैं फिर से असफल रहा।
जिनके सुख-दुख मेंं साथ चला था,वही मुझसे अब विमुख हुए!
मन अशांत सा लगता रहा,शांति की चाह में भटकता रहा,
धीरे धीरे-धीरे धीरे, मैं भी उनसे दूर हुआ!
अब-यदा -कदा वह मिलते हैं, तो,इक दूरी सी दिखती है!

उनमें रहता है संकोच भाव,तो मुझमें हिचक सी रहती है।
मेरी दिनचर्या में है बदलाव अब ,मै हू अपने मे ही सिमटा हुआ।
गृहस्थ जीवन के भार हुए पूर्ण,अब निषःकाम भाव से रहता था,
इच्छा हुईं दर्शन की तो,बाबा केदार के.संग बद्री विशाल के द्वार चला।
पुत्र का भी मिला आमंत्रण,देवालयों के दर्शन का।
पुत्र-बहू रहते हैं, दूर प्रदेश में,नाम जहां का कर्नाटक है,
यहीं निकट पास में विराजते,माँ तिरुमाला,व तिरुपति बाला जी हैं!
हम दंपति चल पड़े इस आमंत्रण पर,
दर्शन का दिन निर्धारित था,तीन मार्च को हम सपरिवार गए!
पहले प्रथम पूज्य सिद्धि विनायक के दर्शन पाए!

आगे बढ़ने पर माँ गंगा हैं,पापनाशनी का रूप धरे,
संकट मोचक बंजरग बली ध्याये, आकाश गंगा के दर्शन पाए।
अब अवसर मिला था,ईश्वर के भोग पान का वो भोजन पाए !
फिर पंक्ति में लग गए, दर्शन पाने को , भीड़ लगी थी भारी!
अब प्रतिक्छा थी हमें,कब आएगी अपनी बारी।
धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, और बढना रखा जारी.!
समय आया वह जिसकी इच्छा से आए थे!
मिला अवसर हम दर्शन कर पाए थे।
प्रसाद पाया-भोग लगाया,और चल पड़े माता के द्वार!
कुछ दूरी पर है माता का दरबार।
संध्या का अब शोर था,सजा हुआ था दरबार,
पुष्प गुच्छ की भेंट संग ,नमन किया तिरुमाला का बार-बार।
श्री चरणों में ध्यान है,नही शेष संताप,
है वंदन परमेश्वर से,सुखी रहे परिवार!
सुखी रहे परिवार ,बंधु-बांधवों के संग!
पुत्रियाँ सुखी रहें सकुटम्भ!,
इस्ट मित्र सुखी रहें,रहे गाँव -देश,खुश हाल!
आनंदित रहे जन गण मन, है यही वंदन!
अगला पड़ाव है,श्री रामेश्वर जी के दर्शन!
करूँ प्रार्थना सर्वेश्वर से, करता हूँ वंदन।
भारत माता के सब जन करें,मातृभूमि का अभिनंदन।

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