कविता · Reading time: 1 minute

तू ही बता ज़िंदगी

तू ही बता ऐ ज़िंदगी,
मैं तुझको अब क्या लिखूँ,
घाव का मरहम लिखूँ या जीत का परचम लिखूँ,
धूप में एक छांव लिख दूं या पुराना गांव लिख दूँ,
धड़कनों की साँस लिख दूँ या सांसो की धड़कन लिखूँ,
तू ही बता ऐ ज़िंदगी,
मैं तुझको अब क्या क्या लिखूँ।
दर्द मेरा छीन ले जो,
मेरी ऐसी दवा हो तुम।
साँस जिससे ले सकूँ मैं,
बहने वाली हवा हो तुम।
रास्तों के काँटों को ,
झेल ले जो खुद ही बढ़कर
मालिक की ऐसी दुआ हो तुम।
तू ही बता ऐ ज़िंदगी
मैं तुझको अब क्या क्या लिखूँ।
मेरे दर्दों को जो अपना दर्द समझे इस जहाँ में।
खुदा के अनमोल तोहफे को बता मैं क्या क्या लिखूँ।
तू ही बता ऐ ज़िंदगी
मैं तुझको अब क्या क्या लिखूँ।
तू ही बता ऐ ज़िंदगी,
मैं तुझको अब क्या क्या लिखूँ।।

5 Likes · 8 Comments · 66 Views
Like
You may also like:
Loading...