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तू, मैं और तनहाईयाँ…

प्रतीक सिंह बापना

प्रतीक सिंह बापना

कविता

May 16, 2016

ये रात का नशा
धुआँ धुआँ आशना
इश्क़ फैला सब जगह
डूबें हैं इसमें सभी
तू, मैं और तनहाईयाँ…

और कोई नहीं यहाँ
ये अकेला कारवाँ
घुम है मंज़िल का निशाँ
फिर भी चलते हैं
तू, मैं और तनहाईयाँ…

तेरे कदमों के निशाँ
चलता हूँ उन पर बारहा
सुनता हूँ तेरी धड़कनों की सदा
खामोशी है और कोई नहीं
बस तू, मैं और तनहाईयाँ…

–प्रतीक

Author
प्रतीक सिंह बापना
मैं उदयपुर, राजस्थान से एक नवोदित लेखक हूँ। मुझे हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखना पसंद है। मैं बिट्स पिलानी से स्नातकोत्तर हूँ और नॉएडा में एक निजी संसथान में कार्यरत हूँ।
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