Sep 2, 2016 · कविता
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तू बरस इतना बरस कि……..

बदली भी बदल गयी
काली घटा देख
बादल में,
कही फट चली
बोझ से….
तबाही का मंजर देकर,
कही बरस पड़ी
अन्न दाता की झोली में
खुशियों की सौगात देकर,
कही बरस गयी तू दूर
महबूब के आँगन में
बिछड़े आँसू बनकर,
कही बरस गयी सावन में
प्रेमी मिलन संग
गीत-संगीत बनकर,
तू बरस इतना बरस
क़ि धुल जाये धरती से
*नफरत का किचड़,
तू बरस इतना बरस
कि बुझ जाये आग
दिलो की***
बस तेरा अहसास शीतलता सा
ठहर जाये,
तपती दुनियां के
तपते गर्म दिमाग के
हम इंसानो में…

^^^^^दिनेश शर्मा^^^^^

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Dinesh Sharma
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सब रस लेखनी*** जब मन चाहा कुछ लिख देते है, रह जाती है कमियाँ नजरअंदाज... View full profile
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