कविता · Reading time: 1 minute

तू कितना बदनाम निकला !

तू कितना बदनाम निकला !
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इंसान के रूप में तुझे भगवान समझा था !
तू तो छद्म वेश में बहुत बड़ा हैवान निकला !!

तेरी काबिलियत पे भरोसा किया था हमने !
तू तो बुद्धू और बहुत बड़ा नादान निकला !!

तेरे चेहरे पर जो सच्चाई की झलक दिखी थी !
वो सब तो बस दिखावा और इक स्वांग निकला !!

कितने सारे वादे मुझसे किये थे उस दिन तुमने !
तोड़ दिये जो तूने , मानो मेरा तो प्राण निकला !!

तेरे कारनामों से अस्त-व्यस्त हो गई है ज़िंदगी मेरी !
अच्छे घराने से होकर भी तू कितना बदनाम निकला !!

तेरी भी हालत अब बद्-से-बद्तर होती जा रही !
मानो किये गये तेरे कुकर्मों का ये परिणाम निकला !!

अब देखते हैं कि ये ज़िंदगी मुझे कहाॅं तक ले जाती है !
भाग्य भरोसे ही छोड़ दूंगा चाहे जो भी अंज़ाम निकला !!

स्वरचित एवं मौलिक ।

अजित कुमार “कर्ण”
किशनगंज ( बिहार )
दिनांक : 21-07-2021.
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