तुम

चाँदनी रात सी सुरमई हो तुम,
कामिनी हो,या छुईमुई हो तुम !
लेखनी उठे कविता लिख्नने को,
उस कवि की अन्कही हो तुम !!
प्यार और वासना के उबाल सी,
चन्द लम्हों की फ़ु्रफ़ुरी हो तुम!!
नही जीवन की इक्मात्र आस्था,
न कभी भूलने सी हो गई हो तुम!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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