कविता · Reading time: 1 minute

तुम हो चाँद गगन के…..

मनमोहक ये छवि तुम्हारी
इस मन में बसा ली है !
पल पल जपता नाम तुम्हारा
दिल बन गया पुजारी है !

बेवफा ना हमें तुम मानो
हमें बस लगन तुम्हारी है !
अपना तुम्हें हम कह सकें
कहाँ ये किस्मत हमारी है !

तुम बिन दिल को चैन नहीं
पल भर लगती पलक नहीं !
पाने को एक झलक तुम्हारी
नजर बन चली भिखारी है !

मुझ चकोर की लघु है सीमा
देखूँ बस दूर से रूप तुम्हारा !
विस्तृत नभ की तुम हो शोभा
पाऊँ कैसे तुम्हें , लाचारी है !

मन ये मेरा मानसरोवर
तुम हो चाँद गगन के !
रात के साए में चमकी
उजली तस्वीर तुम्हारी है !

जितना तुम्हें चाहा है मैंने
तुम भी मुझे चाहोगे उतना !
चुकाना होगा कर्ज तुम्हें ये
मेरी तुम पे रही उधारी है !

-डॉ0 सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद ( उ०प्र०)

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