Skip to content

“तुम शब्द बन कर आ गये”

Dr.Nidhi Srivastava

Dr.Nidhi Srivastava

कविता

September 13, 2016

तुम्हे ही तो लिख रही थी
कि तुम शब्द बन कर आ गये,
शान्त स्निग्ध नयनों से,
अविराम दृष्टि गड़ाये हुए ,
अक्षरों की ओट से निहारते,
मन के पुलिन तट पर ,
असंख्य स्पन्दित कामनायें,
उल्लसित हो प्रदीप्त हो उठी,
तुम्हे ही तो पढ रही थी,
कि तुम अर्थ बन कर आ गये,
मंद मुदित स्मर स्मिति से,
स्वप्निल स्पृहा बिछाये हुए,
पुस्तक की ओट से निहारते,
जीवन के सुमधुर पल पर ,
कम्पित नादमय संगीत जो ,
बनकर सारंगा सी झूम उठी||
…निधि …

Share this:
Author
Dr.Nidhi Srivastava
"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you