तुम राधा नही होती,, तो प्रेम पूजा नही जाता

ठहर कर देखा है ऋतुओ को
की
अब सहा ,, नही जाता ,,

तुम्हारे बिन भी बसंत है,, बहारे है,,
ये मुझसे कहा ,, नही जाता ,,

मर्यादाओ से गढी ,, तुम

तुम बिल्कुल ठीक कहती थी

परिपक्व परिचय बन कर ,, सरिता मे ,,
मुझसे बहा ,,नही जाता ,,

गढ्ढे है अब ,,
जो गुलाबो के घरोंदे थे ,,
भर भी जाते ,, जो साथ देती तुम ,,
तन्हा कुछ भी
मुझसे भरा ,, नही जाता ,,

आंधियो मे भी ,, मै तेरी ,,
रौशनाई का तारा था ,,
खालीपन की कालिख है की ,,
जूगनु सा भी
मुझसे जला ,, नही जाता ,,

तेरे समर्पण और त्याग मे मेरी
माना
धरा अम्बर की दूरी है

मौन लगाए तुम बैठी हो
और कुछ मुझसे बोला ,, नही जाता

कुछ तो कस्तुरी हो तुम भी
जो मन कोई दूजा ,, नही भाता
तुम राधा नही होती तो
प्रेम भी पूजा ,, नही जाता
सदानन्द
8/01/2018

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