गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

तुम बग़ैर

हमें बेचैन करके यूँ ,तुम्हें चैन अग़र आ जाए
शब-ए-फुरक़त में भी हमें चाँद नज़र आ जाए

ये उदासियों से लिपटा चेहरा क्या चाहता है
तुम ख्यालों में ही आ जाओ तो असर आ जाए

हमारी परछाई हमसे ही रूठी है,देखो आजकल
तुम हँस दो ज़रा ज़ोर से तो पल में सहर आ जाए

तुम बग़ैर ख़ाली ख़ाली सी है ,ये ज़िन्दगी हमारी
आके भर दो फ़िर से, शायद हमें क़दर आ जाए

खुशियाँ भागी भागी सी फ़िरती है,इधर नहीं आती
तुम चाहो अग़र तो सारी ख़ुशी हमारे दर आ जाए

इश्क़ नहीं तो रफ़ाक़त सही, थोड़ी सी चाहत सही
ग़ुम हो गए हैं, तुम उंगली पकड़ लो तो घर आ जाए

___अजय “अग्यार

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