कविता · Reading time: 1 minute

तुम बिन कैसे जिऊँ

तुम बिन कैसे जिऊँ
ना कुछ खाऊँ पिऊँ

दूर रह सकता नहीं
पास कैसे तेरे आऊँ

जब से है देखा तुझे
दिल चैन नहीं पाऊँ

आसपास ही रहूँ तेरे
तेरे संग मैं रहना चाहूँ

दूर तुमसे रहना नहीं
साया हम साया बनूँ

नहीं होश हवास रहे
ख्यालों में खोया रहूँ

महकान तेरी मधु हैं
महका महका फिरूँ

फूल तुम गुलाब का
तोड़कर मैं पास रखूँ

तुम मधुर संगीत हो
प्रेम गीत गाता चलूँ

रूप की महादेवी हो
तेरा हुस्न मुरीद बनूँ

साज तुम प्यार का
ताल मैं बजाता चलूँ

तुम हो उगता सूरज
मैं ढली हुई शाम बनूँ

तुम चमकता चाँद हो
मैं तारों भरी रात बनूँ

दहकती धूप हो तुम
शीतल तेरी छाँव बनूँ

तुम बिन जाऊँ कहाँ
तेरा सिरजनहार बनूँ

मंजिल तुम प्रेम की
पाने की तेरी राह बनूँ

तुम बिन कैसे जिऊँ
ना कुछ खाऊँ पिऊँ

सुखविंद्र सिंह मनसीरत

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