गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

तुम न समझोगे

जहाँ की भीड़ में तन्हा हूँ तुम न समझोगे
छुपाकर दर्द को हंसता हूँ तुम न समझोगे

सुकूनो चैन भी दिल का मुझे मिला न कभी
हयात जी के जो समझा हूँ तुम न समझोगे

निभाए ख़ूब हैं रिश्ते सभी से दुनिया में
रिवाजो रस्म जो जाना हूँ तुम न समझोगे

पलों के खेल में गुज़री हैं सैंकड़ों सदियाँ
अज़ल से वक़्त का पहिया हूँ तुम न समझोगे

मगर ये सच है ग़म-ए-दोश हूँ हक़ीक़त में
अजीब हाल में रहता हूँ तुम न समझोगे

जिसे ये लोग समझते हैं इक समुन्दर सा
किसी की आँख का क़तरा हूँ तुम न समझोगे

हवाएँ तेज बहें या के आँधियाँ भी चलें
सदा चराग़ सा जलता हूँ तुम न समझोगे

मिटा के बुग़्ज़ जहाँ से दिलों को जोड़े जो
किसी का नेक इरादा हूँ तुम न समझोगे

निशाँ किसी को दिखा दे जो रास्तों के सभी
वही मैं काग़जी नक़्शा हूँ तुम न समझोगे

किसी को सच में जो ‘आनन्द’ लाए मंज़िल तक
वही कमाल का रस्ता हूँ तुम न समझोगे

शब्दार्थ:- ग़म-ए-दोश = sorrow of last night

– डॉ आनन्द किशोर

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