कविता · Reading time: 1 minute

…तुम केंद्र हो जीवन वृत्त की

नारी तुम सिर्फ जीवन वृत्त नहीं
इस वृत्त की केंद्र बिंदु हो
चाहे इसके चारों ओर
परिधि की हो लकीरें खीचीं
केंद्र हो फिर भी तुम क्यों
इस परिधि में कैद हो जाती
तुम अपना वजूद समझो तो
जीवन वृत्त विस्तृत कर सकती
परिधि के अंदर सिर्फ तुम नहीं
वृत्त का रूप भी तुम पर है निर्भर
केंद्रबिंदु जब भी डगमगाया
वृत्त ने रूप विकृत ही पाया
समझो अपने अस्तित्व को
परिवर्तन कर अपने अर्क में
परिधि को ही विस्तृत कर दो

कमला शर्मा

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