कविता · Reading time: 1 minute

तुम आ गये

खुले मन से मैंने जो तुमसे कहा,
शुक्रिया है तुम्हारा जो तुमने सुना
हवा भी बसंती जवां हो गयी,
मेरी जिंदगी की सुबह हो गयी,
जीवन के पतझड़ का अन्त हो गया,
प्रिये! तुम आ गये तो बसंत आ गया।।

वो कुछ तो कहेंगे जब हम तुम चलेंगे
राहों में कांटें तो बिल्कुल बिछेंगे
पर सच है अंधेरा भी छंट कर रहेगा
सुखों के कुसुम पर हम पांव धरेंगे
तुम क्या गये! मन विकल हो गया-
प्रिये! तुम आ गये तो बसंत आ गया।।

हमने वो सपने थे देखे जो मिलकर
झिलमिल सी दुनियां सितारे जमीं पर
कभी मेरी नजरें तो बुढ़ी भी होंगी
तब भी तुम दिखना हसीं यूं ही बनकर।
मेरे हाथों में तेरा हाथ आ गया…..
प्रिये! तुम आ गये तो बसंत आ गया।।

####ऋतुराज
मुजफ्फरपुर बिहार

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