*"तुम्हे पैगाम"*

*”तुम्हे पैगाम”*

चाहत किसे है कितनी,
नही ये बात कहने की।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।१।।

अंतरंग पलों को हम यूँ,
चौराहों पे आम नहीं करते।
खुले आम बदनाम कर,
तुम्हे पैगाम नहीं करते।।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।२।।

तुम क्या हो बस ये तो,
महसूस होना चाहिए।
तुम्हारे चर्चे हम कभी,
सरे आम नहीं करते।।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।३।।

सोचती हो क्या बस,
मुझे महसूस होने दो।
अपनों की हिफाजत,
यूँ अवाम नही करते।।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।४।।

मिन्नतें करके भी कभी,
कोई मिला है किसी को।
एक तरफा मुहब्बत कर,
सुबह से शाम नहीं करते।।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।५।।

पहली मुहब्बत माँ से है,
हर घड़ी आंखों में है रहती।
दूसरी तुम हो प्रिये कह दूं,
धुरी-धुर धाम नहीं करते।।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।६।।

गम हजारो हैं जमाने के,
गले से क्यों लगायें हम।
क्यों न घोल मधु शब्दों में,
घर-सुर धाम नहीं करते।।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।७।।

अराजकता में अनुशासन,
हर पल घर की चाहत है।
स्वछंद बच्चे कभी देखो,
किसी का नाम नहीं करते।।
कहने को बहुत कुछ है,
पर बातें तमाम नही करते।।८।।

*कमलेश कुमार पटेल “अटल”*
दिनांक : १६/०९/२०१९
समय : प्रातः ९:३० घटि

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