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तुम्हें खबर तो है न?

Ankita Kulshreshtha

Ankita Kulshreshtha

कविता

April 16, 2017

मेरी जिंदगी की किताब के
हर वरक हर हरफ़ हर शिफ़हे पर
तुम्हारी खामोश मौजूदगी
मजबूत दरख़्त सा भरोसा मेरा
तुम हो यहीं कहीं
जिस्म तो दूर है
पर रूहानी एहसास तुम्हारा
हर लम्हा हर पल हर शिम़्त
वहीं मुङा है उस पन्ने का कोना
जहाँ छूटी थी
हमारी अधूरी कहानी
कैसा राब़्ता है ये
कि जब लिखती हूँ
सिर्फ़ तुम्हें लिखती हूँ..
तुम्हें खबर तो है न…?
कि जब पुरजोर कोशिशें भी
हार जाती हैं
तुम्हें पाने की और
नतीज़ा शिफ़र रहता है
तब उम्मीद की लौ
फङफङाती है
मेरी जिंदगानी के स्याह पहलू को
रोशन कर ने को
तुम्हारी बेइंतहा जरूरत है…
तुम्हें खबर तो है न….?
©
अंकिता श्रेष्ठा

Author
Ankita Kulshreshtha
शिक्षा- परास्नातक ( जैव प्रौद्योगिकी ) बी टी सी, निवास स्थान- आगरा, उत्तरप्रदेश, लेखन विधा- कहानी लघुकथा गज़ल गीत गीतिका कविता मुक्तक छंद (दोहा, सोरठ, कुण्डलिया इत्यादि ) हाइकु सदोका वर्ण पिरामिड इत्यादि|
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