तुम्हीं सब्र तुम्हीं जब्र रहे होगे उसका

हदफ़ बन कर तुम शायद रह गए होगे उसका
वक़्त की पैकर में दिल छिल गया होगा उसका

उतरती रात की अंगनाई में चल कर आई तो होगी
तुम मिले न होगे तो ख़ाब मसल गया होगा उसका

न जाने तुमको उस लम्हा उससे कितने गिले होंगे
पलकों के बाल पेशानी पे तेरे जब मिले होंगे उसका

सहर के अंगनाई में तुम्हीं ने लगाई खूब रौनकें होगी
तुम्हीं से शाम की शोखी जवान होती हो शायद उसका

~ सिद्धार्थ

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