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तुम्हारे मिलकर जाने के बाद...

क्या रहस्य है यह
आखिर क्यों हो जाता है
बेमानी और नागफनी-सा दिन
तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…

क्यों हो जाती है उदास मेरी
तरह घर की दीवारें-सोफा
मेज पर धरी गिलास-तश्तरियाँ
और हंसता-बतियाता पूरा का पूरा घर…

क्यों डरने लगते हैं हम मन ही मन मौत से तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…

क्यों हमारी पूरी दुनिया और खुशियाँ
सिमटकर समा जाती है तुम्हारे होठों की मुस्कुराहटों में
तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…

क्यों घंटो हँसता और बोलता बतियाता
रह जाता हँ मैं तुमसे
तुम्हारे जाने के घंटों बाद भी…

क्यों महसूसने लगता हूँ मैं
एक अजीब-सी रिक्तता और व्याकुलता
तमाम सुख सुविधाओं के होते हुए भी
तुम्हारे जाने के बाद…

क्यों बार-बार तुम्हारी ही पहलू में
लौट जाने को मचलता है मन
सागर की लहरों की तरह…

क्यों उलझा रहने को करता है मन
तुम्हारे ही ख्यालों विचारों में दिन-रात
माला में धागा की तरह तुम्हारे मिल कर जाने के बाद…

डॉ. विवेक कुमार
तेली पाड़ा मार्ग, दुमका, झारखंड।
(सर्वाधिकार सुरक्षित

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Dr. Vivek Kumar
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