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तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…

Dr. Vivek Kumar

Dr. Vivek Kumar

कविता

April 12, 2017

क्या रहस्य है यह
आखिर क्यों हो जाता है
बेमानी और नागफनी-सा दिन
तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…

क्यों हो जाती है उदास मेरी
तरह घर की दीवारें-सोफा
मेज पर धरी गिलास-तश्तरियाँ
और हंसता-बतियाता पूरा का पूरा घर…

क्यों डरने लगते हैं हम मन ही मन मौत से तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…

क्यों हमारी पूरी दुनिया और खुशियाँ
सिमटकर समा जाती है तुम्हारे होठों की मुस्कुराहटों में
तुम्हारे मिलकर जाने के बाद…

क्यों घंटो हँसता और बोलता बतियाता
रह जाता हँ मैं तुमसे
तुम्हारे जाने के घंटों बाद भी…

क्यों महसूसने लगता हूँ मैं
एक अजीब-सी रिक्तता और व्याकुलता
तमाम सुख सुविधाओं के होते हुए भी
तुम्हारे जाने के बाद…

क्यों बार-बार तुम्हारी ही पहलू में
लौट जाने को मचलता है मन
सागर की लहरों की तरह…

क्यों उलझा रहने को करता है मन
तुम्हारे ही ख्यालों विचारों में दिन-रात
माला में धागा की तरह तुम्हारे मिल कर जाने के बाद…

डॉ. विवेक कुमार
तेली पाड़ा मार्ग, दुमका, झारखंड।
(सर्वाधिकार सुरक्षित

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Author
Dr. Vivek Kumar
नाम : डॉ0 विवेक कुमार शैक्षणिक योग्यता : एम0 ए0 द्वय हिंदी, अर्थशास्त्र, बी0 एड0 हिंदी, पी-एच0 डी0 हिंदी, पीजीडीआऱडी, एडीसीए, यूजीसी नेट। उपलब्धियाँ : कादम्बिनी, अपूर्व्या, बालहंस, चंपक, गुलशन, काव्य-गंगा, हिंदी विद्यापीठ पत्रिका, जर्जर-कश्ती, खनन भारती, पंजाबी-संस्कृति, विवरण पत्रिका,... Read more
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