.
Skip to content

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …….

sushil sarna

sushil sarna

कविता

July 28, 2016

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …….

कितने वज्र हृदय हो तुम
इक बार भी तुमने मुड़कर नहीं देखा
तुम्हारी एक कंकरी ने शांत झील में
वेदना की कितनी लहरें बना दी
और तुम इसे एक खेल समझ
होठों पर हल्की सी मुस्कान के साथ
मेरे हाथों को अपने हाथों से थपथपाते हुए
फिर आने का आश्वासन देकर
मुझे किसी गहरी खाई सा तनहा छोड़कर
कोहरे में स्वप्न से खो गए
और मैं तुम्हें जाते हुए
यूँ निहारती रही
मानो रूह जिस्म से दगा कर गयी
किसी आशंका के चलते
मैं पतझड़ में
वृक्ष से गिरे टूटे पीले पत्ते की मानिंद
हवाओं के रहमो करम पर
टुकड़े टुकड़े बिखरने को रह गयी
उस झील को
इक बार तो मुड़कर देखते
उसके सीने पर
बेरहम वार से आहत
दर्द कितनी देर तक
लहरों में तैरता रहा
और उसमे
झिलमल करता तुम्हारा शशांक
लहरों के साथ दर्दीली छवि लिए
तुम्हारे बाहुपाश के लिए मचलता रहा, मचलता रहा …………….

@सुशील सरना

Author
sushil sarna
I,sushil sarna, resident of Jaipur , I am very simple,emotional,transparent and of-course poetry loving person. Passion of poetry., Hamsafar, Paavni,Akshron ke ot se, Shubhastu are my/joint poetry books.Poetry is my passionrn
Recommended Posts
श्री कृष्णजन्माष्टमी का पर्ब आप सबको मंगलमय हो
उत्थान पतन मेरे भगवन है आज तुम्हारे हाथों में प्रभु जीत तुम्हारें हाथों में प्रभु हार तुम्हारें हाथों में मुझमें तुममें है फर्क यही मैं... Read more
मैं, और मेरी पायल, अक्सर, एक बात कहा करते है, कि, शायद, तुम न मिलते, तो ,मैं कभी, पायल का दिया, अहसास, तुम संग बिताया,... Read more
राखी
दीदी, जानता हूँ इस बार भी तुम नहीं भेज पाओगी, राखी ! पर जब तुम गुजरोगी बाज़ार से, उन रेशमी डोरियों को, अपनी मखमली आँखों... Read more
और तुम कहते हो कि तुम सुखी हो !
तुम केवल बाहर से हँसते हो, दिखावटी.. अंदर से बेहद खोखले हो तुम, घुटन, असंतुष्टि, पीड़ा, अपमान, अहम्, ईर्ष्या.. इन सबको कही गहरे में लपेटे... Read more