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तुम्हारी वसीयत

Rajni Chhabra

Rajni Chhabra

कविता

February 7, 2017

सहेज कर रखूँगी
वतन की आन की ख़ातिर
जो शौर्य की वसीयत
तुम मेरे नाम कर गए

मुस्कुरा कर सहूँगी
वक़्त का हर सितम
देशभक्ति का जज़बा
कभी न होगा कम

शहादत के जो फूल
डाले तुमने मेरे आँचल में
उनकी खुशबू से
महकेगा वतन

मैं ही जीजाबाई
मैं ही अमर सिंह राठौड़ की माँ
लोरी की जगह
सुनाऊँगी बेटों को
शहादत की दास्तान

फिर से आँच आई
ग़र देश की आन पर
और माँगा
धरती माँ ने बलिदान
वतन की शान पर
कर दूँगी हॅंसते हॅंसते
अपने लाडले क़ुर्बान

जो जान देते हैं
वतन की राह पर
छोड़ जाते हैं
क़ुरबानी के
नक़्श-ए -पाँ
जिन पर चल कर
नयी पीढी रखती क़ायम
आज़ाद वतन, आज़ाद जहान

रजनी छाबड़ा

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Author
Rajni Chhabra
कवियत्री व् अंकशास्त्री /हिंदी, इंग्लिश , पंजाबी में कविता लेखन व उर्दू, राजस्थानीं, पंजाबी से हिंदी , इंग्लिश में अनुवाद कार्य, रचनाएं व इंटरव्यू दैनिक भास्कर, राजस्थान डायरी,अमर उजाला, अनुवाद परिषद्, देहली, इंडियन लिटरेचर, साहित्य अकेडमी द्वारा प्रकाशित /होने से... Read more

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