तुम्हारी बेटियां है ...

हमें भी खिलखिलाने दो ज़रा सा मुस्कुराने दो.
तुम्हारी बेटियां है हम हमें धरती पे आने दो.

बहुत मासूम हैं ये बच्चियां पढने पढ़ाने दो.
नई फसलें विचारों की दमागों को उगाने दो.

गिराकर मैं की दीवारें मिटा दो भेद की दुनिया,
मुहब्बत जीतने निकलो तो खुद को हार जाने दो.

इन्हें मर्दों के कन्धों से जरा कन्धा मिलाने दो.
नहीं हैं कम ज़माने से ज़माने को दिखाने दो.

तमन्ना है हरे पेड़ों के मौसम सब्ज़ हो जाएँ,
ज़रा ये तितलियां महकें ये पत्ते चहचहाने दो.

हम अपने मन की सुनते और बेपरवाह रहते हैं,
उठाता है कोई हम पर अगर ऊँगली, उठाने दो.
…सुदेश कुमार मेहर.

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