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तुम्हारी बातों पे चल के देखता हूँ

Yatish kumar

Yatish kumar

मुक्तक

November 9, 2017

तुम्हारी बातों पे चल के देखता हूँ

तुम्हारी बातों पे चल के देखता हूँ
एक और सहर ठहर के देखता हूँ
तुझसे ताउम्र बँध जाने की चाहत में
आसना की साँकल चढ़ा के देखता हूँ

तुम्हारी बातों पे चल के देखता हूँ
मैं ख़ुद को बदल के देखता हूँ
मेरा मक़सद तो मैं नहीं,तुम हो
थोड़ा तुझ में ही चल के देखता हूँ

तुम्हारी बातों पे चल के देखता हूँ
थोड़ा तुझको समझ के देखता हूँ
मेरी आहट का तुझको पता न चले
थोड़ा तेरे पैरों से चल के देखता हूँ

तुम्हारी बातों पे चल के देखता हूँ
ख़ुद को ख़ुद से समझ के देखता हूँ
तेरी ज़ुल्फ़ों को और सुलझाने में
थोड़ा ज़िंदगी से उलझ के देखता हूँ

तुम्हारी बातों पे चल के देखता हूँ
तेरी रातों से गुज़र के देखता हूँ
ये इश्क़ है,क्या कहे और क्या क्या दिखा दे ?
तेरी नज़रों से ही इश्क़ को समझ के देखता हूँ

यतीश २/११/२०१७

Author
Yatish kumar
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