कविता · Reading time: 1 minute

तुम्हारा चेहरा ।

तुम्हारे चाँद से ये चेहरों पर , तेरी जुल्फों का जो पहरा है ।
मेरा इश्क़ इतना सच्चा है , जितना समंदर का पानी गहरा है ।

मैंने नजरें उठा कर ढूंढ ली हर जगह मगर..
मेरी आँखें भी अब तुम पर ही तो जाकर ठहरा है ।

बड़ी आरजू , बड़ी मिन्नतें , बड़ी तमन्ना थी तुम्हें पाने की
तब जाकर इश्क़ का परचम यहाँ लहरा है ।

मेरे हिस्से में बेशक़ तुम्हें आना था शायद ..
देखों न तब ही तो ये मौसम कितना सुनहरा है ।

तुम आवाज़ कभी लगाना तो हम तक ही पहुचेगी ,
ये दुनिया वैसे भी तो आजकल बिल्कुुुल ही बहरा है ।

अब किसकी उम्मीदें किसकी चाहत पूरी होती है
ये बस्तियां अब बस्तियां नही ये तो सहरा है ।

– हसीब अनवर

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