Jul 28, 2016 · कविता

तुममें वो पुरानी बात ढूंढती हूँ,,

तुममें मैं वो पुरानी बात ढूंढती हूँ,
ढूंढती हूँ वो बीते लम्हे भी,
सच में,वो चाँद रात ढूंढती हूँ
तुममें मैं वो पुरानी बात ढूंढती हूँ,,,,
*
वर्षों का बीतना न बदल पाया मुझे,
तुमने ठहराव को अपनाया ही नहीं,
लम्हा दर लम्हा,तुम बदलते रहे,
और,मुझे बदलना आया ही नहीं,
उसी मोड़ उसी चौराहे खड़ी,
रस्ता-ए-साथ ढूंढती हूँ,
तुममें मैं वो पुरानी बात ढूंढती हूँ,
ढूंढती हूँ वो बीते लम्हे भी,
सच में,वो चाँद रात ढूंढती हूँ
तुममें मैं वो पुरानी बात ढूंढती हूँ,,,,
*
वो सादगी,वो भोलापन,वो मासूमियत,
गुमते गुमते हो ही गयी न गुम,
शातिर ज़माने की आबोहवा तुम्हें,
उड़ाते उड़ाते ले ही गयी न चुन,
तुममें न जाने इतने पर भी क्यूँ,
मैं वो बागपन ढूंढती हूँ,
तुममें मैं वो पुरानी बात ढूंढती हूँ,
ढूंढती हूँ वो बीते लम्हे भी,
सच में,वो चाँद रात ढूंढती हूँ
तुममें मैं वो पुरानी बात ढूंढती हूँ,,,,

****शुचि(भवि)****

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Physics intellect,interested in reading and writing poems,strong belief in God's justice,love for humanity.
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