गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

तुमने पुकार कर

देखा नही कभी मुझे तुमने पुकार कर
मैं लौटता चढ़े हुए दरिया को पार कर

है कैसी आग ये लगी उठता रहा धुआँ
जाए कहीं नहीं मुझे ये खाकसार कर

फूलों में हो बसर या मिले खार ही मुझे
लो मैं चला सनम तेरी दुनियाँ सँवार कर

कुछ भी नही है मेरा यादों के ही साये हैं
सूरत सनम तेरी चले दिल मे उतार कर

बहते रहे हैं अश्क़ सदा आँख से मेरे
यूँ छोड़ वो गया मुझे क्यों अश्कवार कर

– ‘अश्क़’

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