तुझे अनमोल फिर ऐ ज़िंदगी कैसे बता मानूँ

रही उम्मीद बस मुझसे सभी का मैं कहा मानूँ
गलत कोई भी हो पर है ज़रूरी मैं के ख़ता मानूँ

मेरे होने न होने का नहीं जब फ़र्क ही कोई
तुझे अनमोल फिर ऐ ज़िंदगी कैसे बता मानूँ

बदल जाती है पल भर में बहुत ही स्वार्थी दुनिया
नहीं दुश्मन हैं ये लेकिन इसे कैसे सखा मानूँ

हमेशा ज़िन्दगी तूने इशारों पर नचाया यूँ
रज़ा जिसमें भी है तेरी उसी में मैं रज़ा मानूँ

हँसाती ज़िन्दगी तू गर रुलाती भी सताती भी
समझ आता नहीं तुझको पराया या सगा मानूँ

गुणों का दे दिया ऐ ज़िन्दगी तूने ख़जाना है
कुचलना जब पड़ा उनको न कैसे वो सज़ा मानूँ

न जाने क्यों लिखी है आँसुओं से तूने ये क़िस्मत
मुझे हक़ भी नहीं अपमान का भी मैं बुरा मानूँ

गले लग मौत के जाऊँ तुझे पाकर ये लगता है
बता कैसे तुझे मैं ‘अर्चना’ में की दुआ मानूँ

11-08-2020
डॉ० अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद

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